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राष्ट्र नायक दुर्गादास राठौड़

dvsdeora 14 August 2026 Articles
राष्ट्र नायक दुर्गादास राठौड़

भारत राष्ट्र की आत्मा उसकी भारतीयता है जो उसे अन्य से पृथक एक विशिष्ट पहचान दिलाती है। भारतीयता में वे सभी विशिष्ट गुण समाहित हैं जिनके निर्वहन के लिए इस भारत राष्ट्र के सपूतों ने अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया। जिसके जीवन चरित्र में ये गुण समाहित थे उसे इस राष्ट्र ने राष्ट्रनायक मानकर आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा पुंज के रूप में प्रतिष्ठित किया। भगवान राम का वचन पालन, मर्यादा रक्षा, त्याग, शौर्य, दायित्व बोध, पर दु:ख कातरता, शरणागत वत्सलता, शत्रु के परिवार के साथ भी गरिमापूर्ण व्यवहार आदि गुण उन्हें राष्ट्रनायक बनाते हैं। ऐसे ही भगवान कृष्ण, भगवान बुद्ध, सम्राट अशोक, सम्राट समुद्रगुप्त, सम्राट हर्षवर्धन, सम्राट पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी आदि अनेक महापुरुष हमारे राष्ट्रीय नायकों की श्रेणी में खड़े होकर हमें प्रेरणा प्रदान करते हैं।
वीरवर दुर्गादास राठौड़ भी इसी श्रेणी में हमारे लिए राष्ट्र नायक हैं। राष्ट्र नायक की पहली विशेषता अपनी मातृभूमि के प्रति भक्ति और उसकी संप्रभुता की रक्षा के लिए सर्वस्व समर्पण करने की उत्कट लालसा होती है। राष्ट्र नायक दुर्गादास राठौड़ के पूरे 80 वर्ष के जीवन में हमें हर घटना में इसके दर्शन होते हैं। साहस, शौर्य, विपरीत परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अनवरत संघर्ष भारतीयता के संवाहक राष्ट्र नायकों के प्रमुख गुण रहे हैं और दुर्गा बाबा के जीवन में रायके वाली घटना, धर्मत का युद्ध, दिल्ली में अजीतसिंह को सुरक्षित निकालने के लिए किया गया लोमहर्षक संघर्ष, मारवाड़ लौटकर मुगलों से संघर्ष, दक्षिण में गोआ तक की उनकी यात्रा, दक्षिण से लौटकर संघर्ष जारी रखना और फिर 70 वर्ष की उम्र में सांभर का युद्ध, उनका पूरा जीवन इन गुणों का पर्याय है। मानवीयता, शरणागत वत्सलता एवं शत्रु के भी धार्मिक विश्वासों की गरिमा का सम्मान भारतीयता में परिलक्षित होते हैं और दुर्गादास जी द्वारा औरंगज़ेब के पुत्र के परिवार के साथ किया गया गरिमापूर्ण व्यवहार उन्हें अपने समकालीन सभी नायकों में इक्कीस सिद्ध करता है।
राष्ट्र नायक का कार्यक्षेत्र किसी स्थान विशेष में आबद्ध न होकर संपूर्ण राष्ट्र हुआ करता है। दुर्गादास जी ने भी अपने आपको मारवाड़ तक सीमित नहीं रखा, उन्होंने उत्तर में हरियाणा व दिल्ली से लेकर दक्षिण में गोवा तक की भूमि को औरंगजेब से अपने संघर्ष के दौरान अपने घोड़े की टापों से नाप दिया। उनके काल में औरंगजेब से संघर्ष में मराठों, सिक्खों व दिल्ली के समीप के जाटों के बीच एक अघोषित सा समझौता नजर आता है। मेवाड़ व मारवाड़ एवं मारवाड़ और ढुंढाड़ को तो उन्होंने मुगलों के सामने एक बनाकर खड़ा ही कर दिया था। वे तो पुर्तगालियों तक से संपर्क साध चुके थे, यह उनके राष्ट्रव्यापी संपर्क को सिद्ध करता है जो एक राष्ट्र नायक में होना आवश्यक है।
एक राष्ट्र नायक अपने राष्ट्र के सामान्य निवासियों को अपना परिवारजन मानकर व्यवहार करता है और उनकी जीवन चर्या में उसका संघर्ष कभी बाधक नहीं हो, इसका सदैव ध्यान रखता है। दुर्गादास जी के पूरे संघर्ष में ऐसा एक भी उदाहरण नहीं मिलता जिसमें उन्होंने संघर्ष के संसाधन जुटाने के लिए किसी आम भारतीय को लूटने का जिक्र हो। उन्होंने अपने संसाधनों की पूर्ति सदैव मुगल थानों को लूटकर की। जब मारवाड़ के मुगल थाने कंगाल हो गये तो मालवा के मुगल थानों को निशाना बनाया परंतु आम नागरिक एवं व्यापारी को कभी निशाना नहीं बनाया।
एक राष्ट्र नायक कभी अपने व्यक्तिगत अहंकार, वीरता, महिमा मंडन की तुष्टि के लिए नहीं बल्कि युग की मांग को पूरा करने के लिए संघर्ष में प्रवृत्त होता है इसलिए वह अपने संघर्ष में कभी भी अपने स्वयं के मनोगत संवेगों को हावी नहीं होने देता। श्रद्धेय दुर्गादास जी के जीवन का अवलोकन करेंगे तो पायेंगे कि उनके लिए उनके लक्ष्य की पूर्ति ही प्रधान बनी रही, उसकी आवश्यकता के लिए उन्होंने आगे बढ़ने, पीछे हटने, सम्मुख युद्ध लड़ने, छापामार पद्धति से लड़ने, समझौता करने, संवाद करने आदि किसी भी तरीके से परहेज़ नहीं किया क्योंकि उनके लिए सदैव अपने व्यक्तिगत मान अपमान से उनका लक्ष्य बड़ा बना रहा।
दुर्गादास जी का पूरा जीवन मर्यादा पालन का पर्याय रहा है, उन्होंने अपने जीवन में महाराजा अजीतसिंह, शहजादा अकबर, शंभाजी, महाराणा राजसिंह, महाराणा जयसिंह, शहजादा अकबर के परिवार, महाराजा सवाई जयसिंह की ही नहीं बल्कि अपने साथ संघर्ष कर रहे साथी सैनिकों की गरिमा का भी कभी खंडन नहीं किया। मर्यादा पालन भारतीयता का प्रमुख लक्षण है और दुर्गादास जी उसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं।
त्याग के बिना भारतीयता की कल्पना नहीं की जा सकती और दुर्गा बाबा का पूरा जीवन त्याग का परिचायक रहा है। औरंगजेब को पूरे जीवन में यह मलाल रहा कि ऐसी कोई संपत्ति नहीं बनी जो दुर्गादास जी को खरीद सके। उन्होंने तो जसवंतसिंह जी की मौत के बाद से ही मारवाड़ के खजाने से वेतन लेना बंद कर दिया था और जीवन भर के लिए बिना मूल्य के बिक गये।

ऐसे बहुत से उदाहरण और घटनाएं हैं जिनको पढ़कर और सुनकर हर कोई दुर्गादास जी की भारतीयता के प्रति स्वाभाविक रूप से नतमस्तक हो जाता है। भारत के सभी राष्ट्र नायकों में बसी भारतीयता के एक दृष्टि में यदि समग्र दर्शन करने हों तो वह ऐतिहासिक चरित्र श्रद्धेय दुर्गादास राठौड़ ही हैं।
भारत की भारतीयता के ऐसे आदर्श प्रतीक को राष्ट्र नायक के नाम से संबोधित करना प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व की बात है।

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