आज हम सब भगवान श्री कृष्ण की जयंती का पर्व जन्माष्टमी मना रहे हैं। भगवान कृष्ण को संपूर्ण अवतार माना जाता है अर्थात जीवन का कोई ऐसा पक्ष नहीं है जो भगवान कृष्ण के जीवन से अछूता रहा हो, मनुष्य जीवन की हर भूमिका के लिए उन्होंने अपने जीवन को उदाहरण बनाकर मार्गदर्शन दिया इसीलिए उन्हें जगद्गुरु कहा जाता है। माता देवकी के पुत्र, यशोदा के लाल, ग्वाल बाल साथियों के मित्र, गोपीयों के रास रचैया, कंस के काल, जरासंध के रणछोड़, बलराम के अनुज, द्वारिका के सृजक, द्रोपदी के सखा, कुरु राजसभा के शांति दूत, अर्जुन के सारथी, गीता के उपदेशक, रुक्मणि सहित आठ पटरानियों के कंत, सोलह हजार कन्याओं के उद्धारक आदि सभी अनेकानेक प्रकार की उनकी भूमिकाएं उनके जीवन का संदेश है और प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में उनके जीवन से अपना मार्ग खोज सकता है। इसीलिए तो उनके द्वारा कुरुक्षेत्र के मैदान में अपने सखा अर्जुन को दिया गया उपदेश ‘श्री मद्भगवद्गीता’ जीवन उपदेश माना जाता है और हर मनुष्य को हर परिस्थिति में उससे मार्गदर्शन मिल जाता है और इसीलिए उनके उस उपदेश को जिसने जिस भाव से पढ़ा उसे उसी भाव का मार्गदर्शन उससे मिल गया।
लेकिन भगवान श्री कृष्ण के संपूर्ण जीवन संदेश को किसी एक वाक्य के द्वारा परिभाषित करना हो तो वह क्या हो सकता है? इस बारे में श्रद्धेय भगवानसिंह जी साहब रोलसाबसर एक घटना का प्रायः उल्लेख किया करते थे। वे बताते थे कि जब भगवान श्री कृष्ण को बहेलिये का तीर लग गया और उनका निर्वाण का समय निकट था उस समय सदैव उनके साथ रहने वाले उनके सारथी दारूक ने उनसे पूछा कि भगवन्, “आप सृष्टि में धर्म की स्थापना करने आये थे, संसार का मार्गदर्शन करने के लिए अवतरित हुए थे और जीवन भर इसके लिए उद्यमशील भी रहे, लेकिन अंत समय में आपका स्वयं का परिवार और कुटुम्ब ही उस मार्ग का अनुसरण नहीं कर पाया और आज आपके महाप्रयाण से पहले आपके होते हुए भी वे आपस में लड़कर समाप्त हो रहे हैं, ऐसे में मेरे लिए क्या आदेश है? आप अंत समय में अपने इस नित्य सहचर को क्या संदेश देना चाहेंगे?” पूज्य भगवान सिंह साहब बताया करते थे कि उस समय भगवान श्री कृष्ण का जबाब था कि “जो मैंने किया वही तुम करो।”
वास्तव में यही उनके जीवन का समग्र संदेश है, उन्होंने जीवन भर धर्म की स्थापना का प्रयास किया, उसके लिए अमृत की रक्षा और विष का विनाश करने के लिए महाभारत जैसे महाविनाशक महायुद्ध का भी आयोजन किया। वे अपने अवतरण से लेकर महाप्रयाण तक बिना थके धर्म की स्थापना में संलग्न रहे और इसके लिए किसी भी प्रकार की अनुकूल प्रतिकूल परिस्थिति उनकी बाधक नहीं बन सकी। कोई अनुकूल या प्रतिकूल परिणाम उन्हें रोक नहीं पाया। कभी भी असफलता की आशंका उनके मार्ग की बाधक नहीं बन पाई, कभी लोक निंदा या स्तुति उन्हें उनके मार्ग से विचलित नहीं कर पाई। उनको गोकुल की मधुर स्मृतियां या देवकी और यशोदा का वात्सल्य भी रोक नहीं पाया। रुक्मणि, सत्यभामा आदि पटरानियां उनकी बाधक नहीं बन पाईं। कंस, जरासंध, दुर्योधन, शंभरासुर आदि का शत्रु भाव भी नहीं रोक पाया तो विदुर, उद्धव आदि का भक्तिभाव भी नहीं रोक पाया, न उन्हें कोई व्यक्तिगत प्रतिज्ञा रोक पाई और ना ही धर्म व नैतिकता के नाम पर पनपी कोई रूढ़ि।
क्योंकि उन्हें भली-भांति ज्ञात था कि………
करने आये, कर न सके तो जीवन तरुवर व्यर्थ फले हैं।
इसलिए उन्होंने दारूक को अपने जीवन का अंतिम संदेश यही दिया कि, जो मैंने किया वही तुम करो और उन्होंने जीवन भर साधूओं का परित्राण किया, दुष्टों का विनाश किया और धर्म की स्थापना की। अपने ही समाप्त हो रहे वंश को नहीं बचा पाने की कोई निराशा उनमें नहीं थी, इस असफलता के कारण भी अपने जीवन लक्ष्य व उसकी प्राप्ति के लिए किए गये प्रयासों पर उनका स्वयं का कोई प्रश्न चिह्न नहीं था बल्कि उस स्थिति में भी पूर्ण विश्वास के साथ वे आश्वस्त थे कि उन्होंने जो किया वही करणीय था और वही करना चाहिए था इसलिए अपने निकटतम सहयोगी को भी वे अंतिम संदेश के रूप में यही कह रहे थे कि जो मैंने किया वही तुम करो।
आज जन्माष्टमी के दिन हम सब उनकी वंदना कर रहे हैं तो हमें उनके इस संदेश को भी अंगीकार करना चाहिए।
श्री क्षात्र पुरुषार्थ फाउंडेशन
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