Articles

“पीढ़ी अंतराल : विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया”

dvsdeora 14 August 2026 Articles
“पीढ़ी अंतराल : विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया”

प्रत्येक नवीन पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी से विचारों, मान्यताओं, जीवन मूल्यों, जीवन शैली, दृष्टिकोण आदि में न्यूनाधिक भिन्नता लिए होती है और इसी भिन्नता को पीढ़ी अंतराल (Generation Gap) कहा जाता है। मानव जाति के इतिहास में पीढ़ी अंतराल एक शाश्वत और वैश्विक परिघटना है। पूर्ववर्ती और अनुवर्ती पीढ़ियों में यह भिन्नता स्वाभाविक और मानव जाति के क्रमिक विकास की दृष्टि से अनिवार्य भी है। यदि यह पीढ़ीगत भिन्नता न होती तो शायद मानव अपनी आदिम अवस्था से ही बाहर नहीं निकल पाता। यद्यपि इस पीढ़ीगत भिन्नता या पीढ़ी अंतराल का माप विभिन्न कारकों यथा तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों, तकनीकी उन्नति, विचार प्रसार के साधनों की उपलब्धता आदि के अनुसार कम व ज्यादा हो सकता है किंतु यह स्वाभाविक भिन्नता मानवता की हर पीढ़ी की अनुभूत सत्यता है। यह पीढ़ी अंतराल मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित करता है चाहे वह परिवार हो, समाज हो, संस्कृति हो या राजनीति हो। बहुधा यह अंतराल दोनों पीढ़ियों के बीच प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तनाव या संघर्ष का जनक भी बनता है। वर्तमान समय में तो यह पीढ़ीगत तनाव व संघर्ष और भी अधिक स्पष्ट, कटु व तीव्र होता हुआ दिखाई पड़ता है। एक ओर नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को रूढ़िवादी, पुरातनपंथी, भीरू और जड़तावादी सिद्ध करने का प्रयत्न करती दिखाई देती है तो वहीं दूसरी ओर पुरानी पीढ़ी को नई पीढ़ी में लक्ष्यहीनता, अकर्मण्यता, अपरिपक्वता और मूर्खता दिखाई पड़ती है। किंतु यदि गहराई से चिंतन किया जाए तो मानव जाति में पीढ़ी अंतराल स्वाभाविक और अनिवार्य होते हुए भी उससे उपजा यह संघर्ष और तनाव अस्वाभाविक और अवांछित है। वस्तुतः पीढ़ी अंतराल तो मानव के लगातार विकास का उत्प्रेरक है, मानव द्वारा अनुभूत व संगृहीत ज्ञान के सातत्य को बनाए रखने और उसे परिष्कृत करने का साधन है। इस दृष्टि से पीढ़ी अंतराल एक सकारात्मक परिघटना है जो मानव को विकास के पथ पर लगातार अग्रसर रखती है। ऐसे में यह विचारणीय है कि पीढ़ी अंतराल अपने इस सकारात्मक स्वरूप को खोकर नकारात्मक रूप लेकर पीढ़ीगत संघर्ष और तनाव का जनक क्यों बन जाता है? ऐसा तभी होता है जब पुरानी व नई पीढ़ी, दोनों ही न तो मानव जीवन के सातत्य और विकास के मूलभूत सत्य को अनुभव कर पाती है और न ही उस सातत्य और विकास के प्रति अपने दायित्व को समझ पाती है। जब भी किसी समाज, राष्ट्र या संस्कृति में यह सातत्य टूटता है, तो उसकी कीमत उस समाज या राष्ट्र की आने वाली पीढ़ियों को चुकानी ही पड़ती है। अतः हर पीढ़ी का यह दायित्व है कि वह इस सातत्य को बनाए रखें। यथार्थ तो यह है कि कोई भी पीढ़ी न तो पुरानी पीढ़ी है और न ही नई पीढ़ी, बल्कि प्रत्येक पीढ़ी सदैव दो पीढ़ियों के बीच की एक कड़ी होती है। इस यथार्थ की उपेक्षा कर अपने को या अन्य को पुरानी या नई पीढ़ी के रूप में परिभाषित करने के प्रयत्न दृष्टिकोण की एकपक्षीयता को जन्म देते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक पीढ़ी अपने से पूर्ववर्ती पीढ़ी द्वारा अनुभूत सत्य और ज्ञान को ग्रहण कर उसे और अधिक परिष्कृत व अद्यतन कर आगामी पीढ़ी को प्रदान करें। वैसे तो हर पूर्ववर्ती पीढ़ी यही प्रयास करती है कि वह अपने ज्ञान को, अपने द्वारा अनुभूत सत्य को नई पीढ़ी को
सौंप दें किंतु इसमें समस्या यह आती है कि सत्य और ज्ञान किसी पर थोपे नहीं जा सकते बल्कि इसमें ग्रहण करने वाले की स्वेच्छा और रुचि भी होनी आवश्यक है। इस रुचि और स्वेच्छा को जागृत करने का प्रयास किए बिना ही जब अपने अनुभूत या संगृहीत ज्ञान को नई पीढ़ी को देने का प्रयास पूर्ववर्ती पीढ़ी द्वारा किया जाता है, तब नई पीढ़ी उसे स्वीकार नहीं कर पाती। इसीलिए हमारी संस्कृति में अपने अनुभूत सत्य और ज्ञान को रुचिकर बनाते हुए उन्हें जीवन के व्यावहारिक पक्षों के साथ जोड़कर नई पीढ़ी तक पहुंचाने परिपाटी स्थापित हुई। हमारे उत्सव, त्यौहार, रीति-रिवाज, साहित्य आदि इसी परिपाटी परिणाम हैं। किंतु साथ ही यह भी समझना आवश्यक है कि सत्य और ज्ञान अपने आप में गतिशील हैं और इसीलिए उन्हें लगातार परिष्कृत रहने की आवश्यकता होती है और यदि ऐसा नहीं किया जाता तो वही अनुभूत सत्य और ज्ञान कालांतर में रूढ़ि में बदल जाते हैं और ऐसी रूढ़ियों को नई पीढ़ी अस्वीकृत करना प्रारंभ कर देती है। इसलिए हर पीढ़ी का यह दायित्व है कि वह अपने पूर्ववर्तियों से प्राप्त ज्ञान को अपने अनुभूत सत्यों के द्वारा परिष्कृत करके अगली पीढ़ी को सौंपे। लेकिन इसे ही अंतिम सत्य के रूप में घोषित करके आगामी पीढ़ी को सौंपने का प्रयास सफल नहीं हो पाएगा, क्योंकि हर पीढ़ी विकास के अगले चरण पर चढ़ने की आकांक्षा लेकर आया करती है और इस आकांक्षा के बाधित होने पर वह विद्रोह का मार्ग अपनाने से भी नहीं चूकती। इसलिए अपने अनुभव को ही अंतिम सत्य घोषित करने के स्थान पर अगली पीढ़ी की क्षमताओं पर विश्वास करना भी पूर्ववर्ती पीढ़ी को आना चाहिए। यह विश्वास नई पीढ़ी में उस रुचि और स्वेच्छा को जागृत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है जिससे उसके द्वारा पूर्ववर्तियों के अनुभवों को स्वीकार कर अपनाया जा सके। पूज्य तनसिंह जी ने अपनी डायरी में इसी दृष्टिकोण को पुष्ट करते हुए एक स्थान पर लिखा है ‘पिता से पुत्र हमेशा सपूत होगा बशर्ते कि उसे भी पिता का सा शिक्षण और परिस्थितियां मिले। साधना में भी हर पूर्व मार्गी से नवागंतुक श्रेष्ठ होगा। पर दुर्भाग्य है कि पूर्व मार्गी को जितने अवसर प्राप्त हुए हैं, उतने और उतनी तीव्रता से नवागंतुकों को प्राप्त नहीं होते। अन्यथा क्षमता का अभाव नहीं दिखाई देता।’ इसलिए हर पीढ़ी का यह दायित्व है कि वह अपनी पूर्ववर्ती और आगामी पीढ़ी के बीच में एक कड़ी की भूमिका निभाए। न तो उसे अगली पीढ़ी का नियंत्रक बनने का प्रयत्न करना चाहिए, और न ही अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ियों के अनुभवों को व्यर्थ घोषित कर उनसे सम्बन्ध विच्छेद करने की भूल करनी चाहिए। परन्तु यह तभी संभव होगा जब मानव जीवन की शाश्वतता और सातत्य का व्यावहारिक अनुभव कराने वाला शिक्षण सभी के लिए उपलब्ध होगा। इस शिक्षण के बिना हर पीढ़ी अपने को पूर्ववर्ती पीढ़ी का बंधक और आने वाली पीढ़ी का नियंत्रक समझने की भूल करती रहेगी और जिस पीढ़ी अंतराल को जीवन के निरंतर विकास की सीढ़ी बनना था, वह दोनों पीढ़ियों के बीच संघर्ष और तनाव का ही जनक बन कर रह जाएगा। श्री क्षत्रिय युवक संघ का शिक्षण ऐसा ही शिक्षण है जो वर्तमान पीढ़ी को अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ियों के ऋण और आने वाली पीढ़ियों के प्रति दायित्व का बोध कराकर उसे उस कर्तव्यमार्ग पर प्रवृत्त करता है जिस पर चलकर वह अतीत और भविष्य के बीच की एक सार्थक कड़ी बन सके।

Share this post

Back to Articles

0 Comments

Be the first to comment on this article.

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *