पूरण सिंह उखरडा
लोकतंत्र में मतदान केवल अधिकार नहीं, बल्कि अपने भविष्य की दिशा तय करने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। मतदाता जिस राजनीतिक दल या प्रत्याशी को अपना मत देता है, उससे उम्मीद भी करता है कि वह उसके हितों, समस्याओं और अधिकारों की आवाज बने। ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर राजपूत मतदाता अपने मतदान के महत्व और उसकी राजनीतिक ताकत को कब समझेगा?
राजपूत समाज लंबे समय से कई महत्वपूर्ण और ज्वलंत मुद्दों को लेकर अपनी नाराजगी अलग – अलग मंचों पर जाहिर करता आ रहा है। जैसे राजनीति में पर्याप्त प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक उपेक्षा, ईडब्ल्यूएस में सरलीकरण समेत अनेक विषय ऐसे हैं, जिन पर समाज के भीतर लगातार चर्चा और असंतोष देखने को मिलता है। लेकिन सवाल यह है कि हमारी इन मुद्दों को लेकर नाराजगी केवल बैठकों, सोशल मीडिया और चर्चाओं तक ही सीमित क्यों रह जाती है?
वैसे राजनीति में किसी भी समाज की वास्तविक ताकत उसकी संख्या से अधिक उसके संगठित मतदान से आंकी जाती है। यदि किसी समाज के मतदाता चुनाव के समय अपने सामाजिक और जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता देते हुए एक राजनीतिक सोच विकसित करें, तो राजनीतिक दलों को भी उन मुद्दों पर गंभीरता से विचार करना पड़ेगा। हालांकि इसके विपरीत यदि मतदान व्यक्तिगत संबंधों, दलगत निष्ठा और वर्षों पुराने राजनीतिक लगाव के आधार पर होता रहा, तो फिर चुनाव के बाद उन मुद्दों की अनदेखी पर सवाल उठाने का नैतिक आधार कमजोर पड़ जाता है।
यह भी एक सोचने वाली बात है कि कोई भी राजनीतिक दल किसी भी समाज के स्थायी मित्र नहीं होते हैं, बल्कि राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार वे बदलते रहते हैं। वैसे लोकतंत्र में किसी भी दल के प्रति स्थायी प्रेम या विरोध से अधिक महत्वपूर्ण यह होना चाहिए कि कौन-सा दल और कौन-सा प्रत्याशी समाज के मुद्दों को गंभीरता से उठाता है। यदि कोई दल समाज के मुद्दों पर सकारात्मक पहल करता है तो उसका समर्थन होना चाहिए और यदि कोई अनदेखी करता है तो लोकतांत्रिक तरीके से अपनी नाराजगी भी व्यक्त करनी चाहिए।
राजपूत समाज को भी इस विषय पर आत्ममंथन की आवश्यकता है। चुनाव के समय भावनात्मक अपीलों, व्यक्तिगत समीकरणों और राजनीतिक नारों से ऊपर उठकर यह चिंतन होना चाहिए कि हमारे प्रमुख मुद्दे क्या हैं। भविष्य में कौन उन्हें प्रभावी ढंग से उठाने का भरोसा देता है?
इसका मतलब किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होना नहीं है, बल्कि समाज अपने मत की कीमत और राजनीतिक प्रभाव को समझ कर उसका उपयुक्त उपयोग करना है। लोकतंत्र में किसी भी समाज को किसी दल का स्थायी वोट बैंक बनने के बजाय अपने मुद्दों के प्रति जागरूक मतदाता बनना चाहिए।
आज आवश्यकता किसी राजनीतिक दल से अंधे प्रेम की नहीं, बल्कि जागरूक राजनीतिक चेतना की है।
सवाल किसी दल से अधिक स्वयं समाज से है कि जब हम अपने मुद्दों पर नाराज हैं, तो क्या हमारा मतदान भी उन मुद्दों की आवाज बन रहा है? यदि नहीं, तो केवल चुनाव के बाद नाराजगी जताने से परिस्थितियां बदलने वाली नहीं हैं।
मतदान लोकतंत्र में सबसे बड़ा हथियार है। इसे भावनाओं के हवाले करने के बजाय विवेक, मुद्दों और भविष्य की चिंता के आधार पर इस्तेमाल करने का समय आ गया है। जिस दिन मतदाता अपने मत की राजनीतिक शक्ति को समझ लेगा, उस दिन राजनीतिक दल भी समाज के मुद्दों को नजरअंदाज करने से पहले कई बार सोचेंगे।
0 Comments
Be the first to comment on this article.