हमारे संविधान ने भारतीय समाज में व्याप्त भ्रांत धारणाओं और विसंगतियों के कारण पनपे भेदभाव एवं अवसरों की असमानता के निराकरण हेतु आरक्षण की व्यवस्था लागू की। इस व्यवस्था के कारण समाज में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं अनारक्षित वर्ग के नाम से चार वर्ग बने। कालान्तर में इसी आरक्षण के कारण अनारक्षित वर्ग के लोगों में असंतोष पनपा और एक स्वाभाविक सी मांग उठी कि अनारक्षित वर्ग के वंचित परिवारों को भी व्यवस्था में अवसरों की समानता मिलनी चाहिए। इसी कड़ी में अनारक्षित वर्ग में से पांचवां वर्ग बना आर्थिक पिछड़ा वर्ग और उसके लिए EWS आरक्षण लागू हुआ लेकिन अधूरा। आज इस अधूरेपन को दूर करने के लिए इसके सरलीकरण की मांग उठ रही है।
प्रायः ऐसा होता है कि कोई एक वर्ग सरकार से कोई मांग करता है तो दूसरे वर्ग के हित प्रभावित होते हैं और इन वर्गों के बीच हितों के टकराव के कारण वर्ग संघर्ष की स्थिति बनती है। लेकिन EWS सरलीकरण की मांग ऐसी मांग है जिसके कारण संविधान सम्मत किसी भी अन्य वर्ग यथा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग के हितों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता।
केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति के लिए 15 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5 प्रतिशत, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत एवं आर्थिक पिछड़ा वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण निश्चित कर रखा है। EWS सरलीकरण की मांग किसी भी अन्य वर्ग के आरक्षण को कम या ज्यादा करने की मांग नहीं है। यह मांग किसी भी आरक्षण को विभाजित कर अलग अलग श्रेणियां बनाने की मांग नहीं है, ना ही यह मांग किसी प्रकार के क्रीमिलेयर को लागू करने की मांग है। यह मांग अन्य वर्गों के आरक्षण की समीक्षा की मांग भी नहीं है ना ही यह मांग अन्य किसी भी वर्ग के अवसरों को कम करने या बढ़ाने की मांग है बल्कि यह मांग संविधान प्रदत्त 10 प्रतिशत आरक्षण की ही जटिल शर्तों में सरलीकरण कर इस तक इसके वास्तविक हकदारों की पहुंच बनाने की मांग है। यह मांग इस आरक्षण से किसी को बाहर करने की भी नहीं है बल्कि अव्यवहारिक एवं पक्षपात पूर्ण सोच से बनाई गई इसकी जटिल शर्तों के कारण जो वास्तविक हकदार वंचित रह गया है, उसे उसका हक दिलाने की मांग है। इस प्रकार यह मांग आरक्षण के कारण किसी वर्ग संघर्ष को बढ़ावा नहीं देती बल्कि आरक्षण के स्वरूप को सर्वसमावेशी बनाती है।
देशराज सिंह लिसाडिया
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