देशराज सिंह लिसाडिया
राजस्थान में शहरों की सरकार बनाने के लिए चुनाव संपन्न हो चुके हैं और निकट भविष्य में गांवों की सरकार बनाने के लिए पंचायती राज चुनावों की दुंदुभी बजने वाली है। गांव के इन चुनावों के लिए वोट करते समय हमारे सामने अनेक मुद्दे हो सकते हैं जो इस बात का निश्चय करें कि हमें वोट किसे और क्यों देना चाहिए। ऐसे ही मुद्दों के बीच एक महत्वपूर्ण विषय है EWS सरलीकरण।
आज केन्द्र सरकार द्वारा EWS आरक्षण हेतु निर्धारित पात्रताएं मूल रूप से गांव विरोधी पात्रताएं हैं, किसान विरोधी पात्रताएं हैं, पशु पालक विरोधी पात्रताएं हैं। अनेक बार ऐसा लगता है जैसे कि इन पात्रताओं को निश्चित करते समय गांव विरोधी मानसिकता सक्रिय रही है, किसान विरोधी मानसिकता सक्रिय रही है अथवा पशुपालक विरोधी मानसिकता सक्रिय रही है और इन्हें इस प्रकार तय किया गया है कि केवल शहरी संभ्रांत वर्ग ही इसका लाभ ले सके। इसी कारण इसमें किसी महानगर के पॉश इलाके में 100 वर्ग गज के करोड़ों रुपये के फ्लैट में रहने वाला इस आरक्षण का पात्र है लेकिन गांव में 200 वर्ग गज से बड़े बाड़ेनुमा कच्चे घर में रहने वाला पशुपालक इसका पात्र नहीं है। इसी कारण शहर में रहने वाला एक व्यवसायी विभिन्न प्रकार के खर्च दिखाकर करोड़ों रुपये कमाते हुए भी यदि दस्तावेजों में अपनी आय को आठ लाख तक सीमित रखे तो इसका पात्र हैं लेकिन गांव में 5 एकड़ बारानी कृषि भूमि का मालिक परिवार इसका पात्र नहीं है, चाहे उसे उस जमीन से वर्ष भर खाने जितना मोटा अनाज भी पैदा नहीं होता हो। शहर के किसी मंदिर में करोड़ों का चढ़ावा लेने वाला पंडित इस आरक्षण का पात्र है लेकिन पांच एकड़ जमीन का मालिक खेतिहर मजदूर इसका पात्र नहीं है चाहें वह अपने परिवार का भरण पोषण मनरेगा (वीबीजीरामजी) की मजदूरी के बल पर कर रहा हो।
कहते हैं भारत गांवों का देश है, कृषि प्रधान देश है, किसानों का देश है इसलिए आजादी के बाद बनी सरकारों की योजनाएं व कानून गांव को केन्द्र में रखकर बनाए गये, किसान को केन्द्र में रखकर बनाए गये, पशुपालक और मजदूर को केन्द्र में रखकर बनाए गए लेकिन यह शायद पहला कानून है जो आर्थिक पिछड़ों के नाम पर गांव में रहने वाले अनारक्षित वर्ग के आर्थिक पिछड़ों के शिक्षा और रोजगार के अवसरों को निर्ममता पूर्वक हड़पता है और सरकार को इस बात का अफसोस नहीं बल्कि वह अपनी पीठ थपथपा रही है कि उसने EWS आरक्षण लागू कर दिया है, चाहें इस आरक्षण के नाम पर शहरी संभ्रांत वर्ग के हितों को साधने के लिए गांव में रहने वाले अनारक्षित वर्ग के किसान, मजदूर और पशुपालक के हितों पर डाका डाला हो।
आगामी दिनों में राजस्थान में गांवों की सरकार चुनने का अवसर आ रहा है, यदि हमें लगता है कि हमारे हितों पर डाका डाला गया है, सरकार की प्राथमिकता के स्तर में शहरी संभ्रांत वर्ग की अपेक्षा हमारी स्थिति अत्यंत निचले पायदान पर है तो अपना विरोध दर्ज करवायें। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारें केवल वोट की चोट से डरती हैं और मतदाता को ऐसी चोट करने का अवसर कभी कभी ही मिलता है, जो ऐसी चोट कर पाते हैं वे अपने हितों का संरक्षण कर लेते हैं और जो नहीं कर पाते वे सदैव उपेक्षा झेलते हैं और उनके नाम पर परोसे गये भोजन पर कोई और ही डाका डालता है।
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