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जैसलमेर स्थापना दिवस एवं राष्ट्रनायक दुर्गादास राठौड़ की जयंती

admin 26 August 2026 Social News
जैसलमेर स्थापना दिवस एवं राष्ट्रनायक दुर्गादास राठौड़ की जयंती

श्री क्षात्र पुरुषार्थ फाउंडेशन ने ‘ प्रेरक वंदन :- कृतज्ञता ज्ञापन ” नाम से किया आयोजन

 

श्री क्षात्र पुरुषार्थ फाउंडेशन द्वारा जैसलमेर स्थापना दिवस एवं राष्ट्रनायक दुर्गादास राठौड़ की जयंती के उपलक्ष में राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान, दुर्गापुरा परिसर में स्थित SIAM  ऑडिटोरियम में विचार गोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम की शुरुआत पूज्य तनसिंह जी के चित्र के समक्ष दीपांजलि एवं प्रार्थना  से हुई।

 

राष्ट्रनायक दुर्गादास को सच्चा वंदन है कि  हम दायित्व बोध सीखें:- सरवड़ी

राष्ट्रनायक दुर्गादास जी के जयंती कार्यक्रम में बोलते हुए क्षत्रिय युवक संघ के वरिष्ठ स्वयं सेवक महावीर सिंह सरवड़ी ने बताया कि दुर्गादास जी के जीवन से हम दायित्व बोध समझे, यही उनका सच्चा वंदन हैं। दुर्गादास जी का जीवन पूरे भारतीय चरित्र का बोध करवाता हैं। स्वामिभक्ति, राष्ट्रप्रेम, स्त्री अस्मिता, कर्त्तव्यपरायणता, शौर्य, त्याग व बलिदान जैसे न जाने कितने प्रतिमान यदि भारतीय इतिहास में किसी एक चरित्र में सहज रूप से मिलते है तो वह है दुर्गादास राठौड़। उनके चरित्र में संपूर्ण भारतीयता के दर्शन होते हैं इसलिए वे सच्चे राष्ट्रनायक हैं।

 

प्रथम सत्र में जैसलमेर के स्थापना दिवस कार्यक्रम में बोलते हुए इतिहास अध्येता राजवीर सिंह चलकोई ने बताया कि जैसलमेर का इतिहास प्रेरक व वंदनीय हैं। शाकों की परंपरा भाटी वंश से शुरू हुई। रेगिस्तान में पानी की कमी को दूर करने हेतु वहां के महाराजाओं ने तालाब खुदवाने के साथ ही तत्कालीन युग में पाठशालाएं व कोर्ट बनाए। वर्तमान इतिहास लेखकों ने जैसलमेर के इतिहास के साथ न्याय नहीं किया।

जैसलमेर के संस्थापक जैसल ने भट्टी संवत् चलाया। उत्तर के भड़ कींवाड विजय राज लांझा ने गजनवी तो गुजरात जाने से रोका।

 

हेमंत नाहटा वरिष्ठ अधिवक्ता राजस्थान हाइकोर्ट ने बताया कि वे

मूल रूप से परिवार जैसलमेर से हैं, आज भी उतना ही जुड़ाव आज भी महसूस करता, मुझे जैसलमेर से होने पर गर्व हैं। मुझे अपने पेशे में जूझने की प्रेरणा जैसलमेर से मिलती है।  जैन धर्म में जैसलमेर के बारे  कहा जाता है “जुहारिए दुःख वारिये” अर्थात जिसे देखने मात्र से दुखों का निवारण हो जाए। ऐसे पवित्र व प्रेरणादायक जैसलमेर को स्वर्णनगरी की उपमा पीले पत्थरों के कारण नहीं उसके रखवाले राजपूत शासकों के 24 कैरेट नैतिक चरित्र, राष्ट्र भक्ति, बलिदान व प्रजावतसलता जैसे अकल्पनीय गुणों के कारण मिली हैं।

 

ललित के पंवार सेवानिवृत वरिष्ठ IAS आज का कार्यक्रम इसलिए भी रोचक हैं कि जेन अल्फा, बीटा से लेकर 80 वर्ष तक की आयु के लोग विराजमान है, इसकी प्रेरणा हमे जैसलमेर के इतिहास से मिली हैं। जैसलमेर कलक्टर रहने के दौरान मैने पाया कि यहां के लोग कितने जीवटता वाले हैं। यहां के किले का एक एक पत्थर अपने स्वर्णिम इतिहास को समेटे हुए हैं। पंडित नेहरू जी ने जैसलमेर के लिए कहा था कि यह पत्थरों पर कविता है। हमें जैसलमेर को हेरिटेज विथ हाइटेक बनाना हैं। वर्तमान में सोलर व विंड का हब हैं लेकिन हमें विकास के साथ साथ संस्कृति व परंपराओं की रक्षा करनी हैं।

 

द्वितीय सत्र में राष्ट्रनायक दुर्गादास जयंती का कार्यक्रम रखा गया। सेवानिवृत लेफ्टिनेंट जनरल एवं प्रतिरोध पुस्तक के लेखक दलीप सिंह हरसोलाव बताया कि तत्कालीन समय में औरंगजेब से संघर्ष दुर्गादास जी की कुशलता, रण कौशल के बल पर संभव हुआ । उन्होंने बताया कि दुर्गादास जी को मिलिट्री के लिए केस स्टडी के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए।

युवा विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने युवाओं को पूर्वजों के इतिहास से सीखने व अपने चरित्र में अपनाने की बात कही। कार्यक्रम का संचालन करते हुए रेवत सिंह पाटोदा ने दुर्गादास के समय की ऐतिहासिक घटनाओं का ब्यौरा दिया। कार्यक्रम में मातृशक्ति के साथ सैकड़ों की संख्या में युवा व बुजुर्ग उपस्थित रहे।

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